न्यूज़- कुरियन एंटोनी
महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में बढ़ रही है। पुरुषों के वर्चस्व वाले हर क्षेत्र में उनकी नुमाइंदगी है। राजनीति भी अछूती नहीं है। आदिवासी क्षेत्र की द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने के बाद महिलाओं की इस क्षेत्र में भाग्य आजमाने की इच्छा और बलवती हुई। महिला आरक्षण और मजबूत हथियार बना।
विपक्षी दल भी लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाने के साथ ही संगठन में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ा रहे हैं। चुनौतियां अब भी हैं, लेकिन उम्मीदें भी कम नहीं हैं। लिंगानुपात से लेकर पोषण की दिशा में काफी कुछ हुआ है, लेकिन अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है।
प्रदेश की महिलाओं की केंद्रीय राजनीति में भागीदारी आजादी के बाद से ही शुरू हो गई थी, लेकिन यह नाममात्र ही थी। पहली लोकसभा में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को मिलाकर 86 सीटें थीं, जिसमें चार महिला सासंद चुनी गईं। इसी तरह महिलाओं की भागीदारी सिर्फ पांच फीसदी थी, जो वर्ष 2019 में करीब 14 फीसदी पहुंच गई। यह बात अलग है कि वर्ष 1971 में उत्तर प्रदेश से 16 महिलाएं मैदान में उतरीं, लेकिन कोई भी सदन में नहीं पहुंच पाई। यह चुनाव कई मायने में अहम था। इसमें एक तरफ इंदिरा गांधी तो दूसरी तरफ मोरारजी देसाई थे।
चुनाव में नई और पुरानी कांग्रेस के बीच संघर्ष था। इंदिरा ने गरीबी हटाओ का नारा दिया और विरोधियों ने इंदिरा हटाओ। इसमें इंदिरा गांधी को देश के मतदाताओं ने स्वीकार किया था। 1977 में विभिन्न दलों से 13 महिलाएं मैदान में उतरीं और तीन लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहीं।